दिल को मिलना वो कोई पहली निहा याद आया, याद जब जब किया उन को तो क्या क्या याद आया, पहली बारिश में भिगोना वो मेरे दामन का, उन का फिर मुझ से लिपटने का मज़ा याद आया, दिल को मिलना वो कोई पहली निहा याद आया, बाद बरसों के कसक आज उठी है दिल में फिर, चाँद देखा तो वो ही माह-ए-लक़ा याद आया, साथ रहते भी तो उन के सिवा क्या याद आता, हो के उन से जुदा उन के सिवा क्या याद आया, दिल को मिलना वो कोई पहली निहा याद आया, बर कहाँ आती है ऐ दोस्त कोई उम्मीदें, ना थीं उम्मीद तो उम्मीद-ए-शिफ़ा याद आया, खाई है चोट कई ज़िंदगी से बढ़ कर भी, जब वफ़ा रास ना आई, बे-वफ़ा याद आया, दिल को मिलना वो कोई पहली निहा याद आया, ना ग़मों में कोई ताक़त थी, ना ख़ुशियों में थी, की मोहब्बत तो अँधेरा वो घना याद आया, मरना दहलीज़ पे उनकी, ना थी क़िस्मत अपनी, आख़िरी वक़्त वो ज़ालिम क्यूँ बड़ा याद आया, दिल को मिलना वो कोई पहली निहा याद आया,
निहा – love
कसक - dragging pain
माह-ए-लक़ा - one whose face is beautiful like moon
बर - to realise like a dream etc.
उम्मीद-ए-शिफ़ा - hope for cure
रास - suitable
दहलीज़ - threshold
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